संजय की अनसुनी कहानी, रेडियो, स्कूटर फिर लोकसभा के प्रत्याशी “सेठ” तक

-ज्योति चौहान

रांची: पिस्का मोड़ पर मोटर पार्ट्स का दुकान चलाने वाले संजय सेठ को टीवी से ज्यादा मज़ा रेडियो पर क्रिकेट कॉमेंट्री सुनने में आता था। अपने दुकान पर बैठे सेठ कानों से रेडियो को लगाकर रखते थे। स्कूटर के आगे बने पैर रखने की जगह पर मोबिल और मोटर पार्ट्स लेकर आना जाना करते। सबसे अच्छी बात अपनी दुबली पतली फिगर, जैसे आज है। सरल, मृदुभाषी।
आज रांची लोकसभा के जनता के लिए भाजपा का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इनसे जुड़ी कई ऐसी बातें जो इन्हें लोकसभा का टिकट दिलवा दी, मैं बताऊँगी। लेकिन उससे पहले यह जानना बहुत जरुरी है संजय सेठ हैं कौन?
संजय सेठ वर्तमान समय में झारखण्ड राज्य खादी बोर्ड के अध्यक्ष हैं। इन्होंने अपने कार्यकाल में तीन बार मोरहाबादी मैदान में भव्य खादी मेला का आयोजन करवाया, जिसके कारण अख़बारों के पन्नें और न्यूज़ चैनलों की सुर्ख़ियों में जगह बना ली। 1993 में रांची मोटर डीलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष चुनाव जीता। इसके बाद 1999 से 2000 तक झारखण्ड चेंबर ऑफ़ कॉमर्स में बतौर अध्यक्ष की जिम्मेदारियां बख़ूबी निभाई।
संजय सेठ की निष्ठा भाजपा के प्रति इतनी ज्यादा थी कि इन्हें रांची महानगर का अध्यक्ष बनाया गया। फिर पार्टी के आलाकमान ने प्रदेश की जिम्मेवारी सौंपी। स्वर्गीय गामा सिंह जब रांची महानगर अध्यक्ष थे उस वक़्त संजय सेठ और छवि विरमानी की बातें लक्ष्मण रेखा सी हुआ करती थी, यूँ कहें कि इन तीनों की तिगड़म काफी चर्चित हुआ करती थी।
बाबूलाल मरांडी जब भाजपा से अलग हुए तो उनकी पार्टी जेवीएम में संजय सेठ ने इंट्री मारी थी। हां पर कुछ महीनों के लिए ही सही, पर गए थे बाबूलाल के साथ। लेकिन वापसी करते ही उन्हें खादी बोर्ड का अध्यक्ष बना दिया गया।
रांची विश्वविद्यालय पत्रकारिता विभाग के शिक्षक मनोज शर्मा ने अपने मोहल्ले में रहने वाले संजय सेठ की कुछ अतीत, अनछुई पहलू पर फेसबुक पर यूँ लिखा।
पार्टी का ठप्पा मायने रखता है, अभी रांची में भाजपा उम्मीदवार संजय सेठ को लेकर लोग सोंच रहें हैं कि, क्या ये जीतेंगे? अरे ई तो हम लोगों के बीच रातू रोड में रहते हैं, अरे ई तो पहले तेल मिल गली में ऑटोपार्ट्स दूकान चलाते थे। क्या ये उतने घाघ हैं, कद्दावर हैं? अब इसका जवाब भी रांची की जनता को ही देना है। अगर संजय सेठ सांसद बने तो बेशक रांचीवासियों की पहुंच आसान होगी और जात पात का असर भी कम होगा। आखिर हमने तो उन्हें दूबले पतले फिजिक के साथ स्कूटर से रातू रोड में बिल्कुल आम आदमी की तरह दोड़ते भागते देखा है। जो सबके लिये हमेशा उपलब्ध रहे बिना किसी बनावटी डिग्निटी और ताम झाम के। तो संजय भैया तनि लच्छेदार भषणवो देना सीख लीजिये, खाली मृदुभाषी होना काफी नहीं।
मनोज शर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं, इनका अनुभव जनता को जागरुक करने में काफ़ी हद तक सहयोग करेगीं।
रामटहल चौधरी की जिद्द सेठ को नुकसान तो पहुंचाएगी। लेकिन सेठ की पहचान सिर्फ शहरी इलाके में होने से गांव छूटता दिख रहा है। हां ये कोशिश की जा सकती है कि किसी भी तरह चौधरी को मना लिया जाये।
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