छठ महापर्व कल से शुरू, नहाय खाय से लेकर उषा अर्घ्य तक का जानें पराक्रम एवं इतिहास 

बिहार और झारखण्ड की पहचान है छठ महापर्व   

छठ महापर्व कल से शुरू, नहाय खाय से लेकर उषा अर्घ्य तक का जानें पराक्रम एवं इतिहास 
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छठ पूजा का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष इसकी सादगी, पवित्रता और लोकपक्ष है. इस व्रत के लिए न विशेष धन की आवश्यकता है न पुरोहित या गुरु के अभ्यर्थना की. जरूरत पड़ती है तो पास-पड़ोस के सहयोग की. यह सामान्य और गरीब जनता के अपने दैनिक जीवन की मुश्किलों को भुलाकर सेवा-भाव और भक्ति-भाव से किये गये सामूहिक कर्म का विराट और भव्य प्रदर्शन है.

छठ विशेष: छठ महापर्व का आरंभ दीपावली के समापन से ही शुरू हो जाता है. कार्तिक शुक्ल पक्ष के षष्ठी को मनाया जाने वाला ये पर्व वैसे तो मुख्य रूप से बिहार और झारखण्ड की पहचान है, लेकिन पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में भी इसकी मान्यता है. 

छठ, भगवान सूर्य की आराधना का पर्व है. सूर्य देव का हिन्दू धर्म में विशेष स्थान है. हिन्दू धर्म के देवताओं में सूर्य ऐसे देवता हैं जिन्हें मूर्त रूप में देखा जाता है. भगवान सूर्य की शक्तियों का मुख्य श्रोत उनकी पत्नी ऊषा और प्रत्यूषा हैं. छठ में सूर्य के साथ-साथ दोनों शक्तियों की संयुक्त आराधना होती है. प्रात:काल में सूर्य की पहली किरण (ऊषा) और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्यूषा) को अर्घ्य देकर दोनों का नमन किया जाता है.

छठ बिहार या पूरे भारत का ऐसा एक मात्र पर्व है जो वैदिक काल से चला आ रहा है. अब तो यह बिहार कि संस्कृति बन चुका है. छठ बिहार के वैदिक आर्य संस्कृति की झलक दिखाता हैं. यह पर्व ऋग्वेद में वर्णित सूर्य पूजन एवं उषा पूजन तथा आर्य परंपरा के अनुसार मनाया जाता हैं.

नहाय खाय

छठ पूजा के पहले दिन नहाय खाय किया जाता है. इस दिन स्नान और भोजन करने का विधान है. पंचांग के अनुसार, इस बार 05 नवंबर को नहाय खाय किया जाएगा.

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खरना

छठ पूजा के दूसरे दिन खरना पूजा होती है. इस दिन महिलाएं नए मिट्टी के चूल्हे पर खीर बनाती हैं. इसके बाद उसे भोग के रूप में छठी मैया को अर्पित किया जाता है. इस दिन पूजा के बाद व्रत की शुरुआत होती है. इस बार खरना पूजा 06 नवंबर को है.

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संध्या अर्घ्य

इसके अगले दिन यानी तीसरे दिन निर्जला व्रत रखा जाता है और डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है. इस बार 07 नवंबर को संध्या अर्घ्य दिया जाएगा.

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उषा अर्घ्य

छठ पूजा के अंतिम दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देने का विधान है. इसके बाद शुभ मुहूर्त में व्रत का पारण किया जाता है और फिर पर्व का समापन 08 नवंबर को है.

प्रसाद 

छठ पूजा का जितना मान है उतनी ही छठ पूजा के प्रसाद का भी मान है. छठ पूजा के दौरान प्रसाद के रूप में ठेकुआ, मालपुआ, चावल के लड्डू अन्य जातें हैं. साथ ही प्रसाद में  फलों और नारियल का भी प्रयोग किया जाता है. ये सभी प्रसाद शुद्ध सामग्री से बनाए जाते हैं और सूर्य देवता को अर्पित किए जाते हैं.

लोक कथाएँ

छठ पूजा की परम्परा और उसके महत्त्व का प्रतिपादन करने वाली अनेक पौराणिक और लोक कथाएँ प्रचलित हैं.

रामायण 

एक मान्यता के अनुसार लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की. सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था.

महाभारत 

एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी. सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्यदेव की पूजा शुरू की. कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे. वह प्रतिदिन घण्टों कमर तक पानी में ख़ड़े होकर सूर्यदेव को अर्घ्य देते थे. सूर्यदेव की कृपा से ही वे महान योद्धा बने थे. आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही पद्धति प्रचलित है.
कुछ कथाओं में पांडवों की पत्नी द्रौपदी द्वारा भी सूर्य की पूजा करने का उल्लेख है. वे अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लम्बी उम्र के लिए नियमित सूर्य पूजा करती थीं.

पुराण

एक कथा के अनुसार राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं थी, तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनायी गयी खीर दी. इसके प्रभाव से उन्हें पुत्र हुआ परन्तु वह मृत पैदा हुआ. प्रियवद पुत्र को लेकर श्मशान गये और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे. उसी वक्त ब्रह्माजी की मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई और कहा कि सृष्टि की मूल प्रवृत्ति के छठे अंश से उत्पन्न होने के कारण मैं षष्ठी कहलाती हूँ. हे! राजन् आप मेरी पूजा करें तथा लोगों को भी पूजा के प्रति प्रेरित करें. राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. यह पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी.

सामाजिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व

छठ पूजा का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष इसकी सादगी, पवित्रता और लोकपक्ष है. भक्ति और आध्यात्म से परिपूर्ण इस पर्व में बाँस निर्मित सूप, टोकरी, मिट्टी के बर्त्तनों, गन्ने का रस, गुड़, चावल और गेहूँ से निर्मित प्रसाद और सुमधुर लोकगीतों से युक्त होकर लोक जीवन की भरपूर मिठास का प्रसार करता है.
शास्त्रों से अलग यह जन सामान्य द्वारा अपने रीति-रिवाजों के रंगों में गढ़ी गयी उपासना पद्धति है. इसके केंद्र में वेद, पुराण जैसे धर्मग्रन्थ न होकर किसान और ग्रामीण जीवन है. इस व्रत के लिए न विशेष धन की आवश्यकता है न पुरोहित या गुरु के अभ्यर्थना की. जरूरत पड़ती है तो पास-पड़ोस के सहयोग की जो अपनी सेवा के लिए सहर्ष और कृतज्ञतापूर्वक प्रस्तुत रहता है. इस उत्सव के लिए जनता स्वयं अपने सामूहिक अभियान संगठित करती है. नगरों की सफाई, व्रतियों के गुजरने वाले रास्तों का प्रबन्धन, तालाब या नदी किनारे अर्घ्य दान की उपयुक्त व्यवस्था के लिए समाज सरकार के सहायता की राह नहीं देखता. इस उत्सव में खरना के उत्सव से लेकर अर्ध्यदान तक समाज की अनिवार्य उपस्थिति बनी रहती है. यह सामान्य और गरीब जनता के अपने दैनिक जीवन की मुश्किलों को भुलाकर सेवा-भाव और भक्ति-भाव से किये गये सामूहिक कर्म का विराट और भव्य प्रदर्शन है.

साभार: विकिपीडिया

Edited By: Subodh Kumar

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